गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

रचनाएं ! जो गाँव में रची गईं ...............!

                                                                         १...
ताड़ी कहे ताड़ से ,कि,मांग करो सरकार से
हमरो रेट बढे के चाहीं,फैसन के रफ़्तार से 

नाम बा हमरो नीसा में,हक बा हमरो हिसा में
सबसे ऊपर हम रहिला खिलल रहिला झिसा में
हम रहीं लबना -लबनी में, दारू बैठे सीसा में

लुक-छीप के मत पीअ मत पीअ लोटा में
फ्री सेल में न पिअब ता अब का पीअब कोटा में  
       (यह रचना तब जन्मी थी जब लालू जी ने ताड़ी पर से टैक्स हटा लिया था                                                                 ...रचनाकार अज्ञात

बुधवार, 23 नवंबर 2011

                                                                   कुंडली
                                                                 .............
नया जमाना आ गया ,मुक्त हुआ व्यापार,
व्यर्थ अर्थ के स्वार्थ का गर्म हुआ बाजार,
गर्म हुआ बाजार ,ये घर-घर घुसा हुआ है
अपना आदम-जात इसी में  फंसा हुआ है,
                     कह मूरख कविराय ,सुनो भारत के भाई ,
                     परमारथ   की गाय   हाँक ले गए कसाई !!
                                                                             .......पवन श्रीवास्तव

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

पाँव उठते हैं कि गिरते हैं ........

पाँव उठते हैं कि गिरते हैं,ये चलना तो नहीं 
चार,  दीवार उठा लेना ही ,  बसना तो नहीं 

उम्र भर भागते रहने से   भला क्या हासिल 
भागना ? भागना होता है , पहुंचना तो नहीं 

ये जो झुकता है मेरा सिर ,तो सिर नहीं हूँ मैं 
यूँ ,एह्तारामे-हकीक़त कोई झुकना तो नहीं 

मैंने लम्हों से सुलह  की है,     जमाने से नहीं  
मेरा छुपना ?मेरा बचना ? मेरा डरना तो नहीं  

तुम जो कहते हो उसे गौर से सुनता है "पवन "
पर ,महज गौर से सुनना ही समझना तो नहीं.
                                                                 ........पवन श्रीवास्तव 


मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011

कल्पना

कल्पना !
अस्वीकार से जनमती है .
अस्वीकार !
ऊर्जा के ऊफान से निकलता है.
ऊर्जा और प्रज्ञा के व्याघात हैं विचार ..........
विचार !
कल्पना नहीं है .
कल्पनाएँ !
आदमी का साथ छोड़ने लगें
तो, प्रलय है.......
फिर महाप्रलय की कल्पना .
फिर नई सृष्टि की कल्पना.......
कल्पना !
तेरे बाँए अनंत अर्ध-विराम हैं.,,,,,,......
तेरे दाएँ कोई पूर्ण-विराम नहीं ...............

                                                     ......पवन श्रीवास्तव

सत्यम शिवम सुन्दरम

सत्य के ,
कटु,तिक्त और रस से रिक्त होने का बयान ?
किसी बाँझ की प्रसव-पीड़ा ,किसी क्लीव की काम-क्रीडा जैसा
अनूठा बयान है .
सरासर झूठा बयान है ....

ध्वनि-विस्तारक चोंगों से चीखतीं
हवाओं में गड्ड-मड्ड होतीं
कटु सच्चाइयाँ ?
झूठ की परछाइयाँ हैं ...
भ्रम-संध्याओं में छायाएं  !
अपनी काया से बड़ी हो गयीं हैं ....

कचकडे के क्लिपों से चपीं,
सूख-सूख कर ऐठ गयीं हैं
रस-श्रावी ग्रंथियां ...!.........इन्द्रियाँ...... ?
मुँह ढाँप कर सो गयीं हैं ..

सच और झूठ के इन कटु-मधु बयानों के संजाल से ..
तड़प भागे .आदमी के पीछे ....
हाथ धो कर पडी हैं ...........
आचार-संहिताओं   की    सशस्त्र सेनाएं .......!!!!!!!!!!!!!!
                                                       ........पवन श्रीवास्तव

रविवार, 31 जुलाई 2011

कहीं भी जाओ..........

कहीं भी जाओ , सदाएँ तलाश लेती  हैं
"फकीर मन को" , दुआएँ तलाश लेती हैं .

ये ऐसा जख्म कि,इसके लिए न रोए कोई
"दिलों के दर्द" ,         दवाएँ तलाश लेती हैं .

नज़र के सामने कर लें या छुप-छुपा के कहीं
"मेरा गुनाह"              सजाएँ तलाश लेती हैं .

सही के  फर्द-बयाँ को दबा के क्या हासिल
"दबी जुबाँ " को      कथाएँ तलाश लेती हैं.

मैं अपना नाम किसी से कहूँ ,कहूँ न कहूँ
मेरा वजूद ,           हवाएँ तलाश लेती हैं .
            
                        .........पवन श्रीवास्तव


मंगलवार, 26 जुलाई 2011

बेचैनी के रक्त-बीज

मैं !
अगर कवि होता ?
तो,
कभी दीवार में सिर नहीं मारता !
नहीं बहता खून , मेरे सिर से
खून की नदी में ,सिर बहते |

मेरे अंतस के उज्बुजाते शब्द !
छछनते छंद !                                                                             
चीर कर निकलते ...
कलम का सतवांस  गर्भ.
बेमेल वर्जनाओं के चटकते टाँकों की प्रतिध्वनि से
झनझना उठते तुम्हारे कान के परदे ...

कितना बड़ा अपशकुन हो जाता ?
कि.......,
मेरी पुतलियों से निकलता ,आग ताप कर सूरज .
मेघ ! उमड़ते,! घुमड़ते,! तड़कते !!
और,......
मेरी गर्म साँसे ?
किसी धधकती ज्वाला-मुखी में तब्दील हो जातीं .

मेरी दमित इच्छाओं कि ऊष्मा से ...
सब कुछ अस्त-व्यस्त हो जाता ...!
सिंघासन कि शोभा !
उतार लाते ,भूमि-पुत्र ,,.
लोग ! जूतों समेत ,धड-धडाते हुए.....
भगवान् के घर में ..घुस जाते.

बंद हो जाता उनका कारोबार ...!
जो, खुद ठंढ से बचने के लिए ,
हमारी पीठ पर ,,ऊन की फसल काटते हैं
और लौट कर ,हमारी ही बस्ती में
गर्म उतरनों की खैरात बाँटते हैं ...|

आखिर !, कब तक चलता यह सिलसिला .......
कि  !......
कभी असंख्य वाणों से बिंधा खरगोश ,कहीं से हाँफता हुआ आता 
समा जाता मेरे भीतर ........
दम तोडतीं अनंत प्यासी नदियाँ ......
तैर -तैर जातीं मेरी शिराओं में ...
आखिर कब तक ......?
कभी ब्रम्हास्त्रों के प्रयोग कि आशंका से सहमी  सभ्यता के ,
विकलाँग भ्रूणों कि सिसकियाँ..,
कभी ,दम तोडती पागल परिभाषाओं का नग्न प्रलाप...
तो ! कभी अपनी जड़ों कि तलाश में भटकते
लाजवंती -वणों का क्रौच-विलाप !......
ऊ...फ ...!
बेचैन हो जाता मैं ..!...बेहाल हो जाता मैं ..!
दरक जाता मर्यादा का बाँध ...
कागजी -कंक्रीट क़ी नींव पर इतरातीं आचार-संहिताओं के गगन -चुम्बी ताश-महल !
भर -भरा  कर ,ढहते !
और.........!
मेरे माथे से टपकते ,बेचैनी के रक्त-बीज !
बन - बना कर उगते ....
ढाँप देते ,धरती का उघड़ता बदन ....!
अगर मैं कवि होता ......
                                                              ................पवन श्रीवास्तव