मंगलवार, 1 जनवरी 2013

मरद भोजपुरिया

झूठ ना बखाने जाने ,छूत -छात माने जाने
माने-जाने सबके ,ना जाने जी-हजुरिया
धुरिया चढ़ावे जाने ,पीठ ना देखावे जाने
दीठ ना लगावे जाने आन के बहुरिया
आन ना लडावे जाने ,जान के ना जान जाने
चले के उतान जाने तान के लउरिया।
बानी मर्दानी जाने चाल मस्तानी "भानु "
हो ला एक पानी के मरद भोजपुरिया।
   
                          ठाट ना बनावे जाने ,काट ना कटावे जाने
                          हाथ ना हिलावे ,चमकावे ना अंगुरिया
                          बात ना बनावे जाने ,बात साफ-साफ जाने ,
                          फट देना रांड ना त भर हाँथ चुरिया।
                          हठ में हमीर ,महाबीर बीर लठ में जे ,
                          बान्हे लट -पट कनपटी ले पगरिया
                          डाँटी के बनल "भानु" माटी के कसल उहे ,
                          खांटी ह जवान उमजल भोजपुरिया ।।

                                                                         स्व भुवनेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव "भानु "                        

बुधवार, 24 अक्टूबर 2012

खतरा है ..........

खतरा है ,खतरा है !
खतरा है ,भाई खतरा है !

गली -गली में शोर मचा है 
खतरा है !

 बच्चा बाहर खेल रहा है ,खतरा है 
सड़क के ऊपर बैग पड़ा है ,खतरा है ,

घर में एक मेहमान अजाना आया है 
घर के बाहर बोर्ड लगा है ,खतरा है 

दरवाजे पर वोट मांगने अया है 
मन के भीतर शोर मचा है ,खतरा है .

माइक ,माला, मंच ,सजावट ,अच्छे हैं 
लेकिन जो इनसे  चिपका है ,खतरा है 

झूठ के पर फैले हैं ,कोई बात नहीं 
सच का साहस टूट रहा है ,खतरा है 

खतरा है ,खतरा है
खतरा है ,भाई खतरा है !!
                                             ....पवन श्रीवास्तव             

मंगलवार, 18 सितंबर 2012

वक़्त से आजाद .......

मुल्क के  आजाद बन्दों   में से मैं  भ़ी
यानि क़ुछ बर्बाद लोगों  में से मैँ भ़ी !

लाख कोशिश हो मगर जाएँ  न दिल से
ऐसी कुछ बेशर्म यादों        में से मैं भी  !

बुझ चुकी उम्मीद के शोले जला दूँ
जिंदगी की चंद साँसों  में से मैं भी  !

हौसले से तख़्त शाहों के पलट दें
 ऐसे ही जाँबाज प्यादों में से मैं भी !

क्या पता  देंगे ये मेरा माहो - साल
वक़्त से आजाद लम्हों में से मैं भी !!
                                                   .......पवन श्रीवास्तव 


 


मंगलवार, 14 अगस्त 2012

तिरंगे लाल चक्रधर ........

एक सज्जन !                                            भाग 1.
केसरिया साफा
सफ़ेद कुरता
हरी लुंगी
जुबान  गूंगी .
खादी -भंडार के प्रवेश -द्वार पर
लटक रहे थे .
 बिक जाना चाहिए था ,
अभी तक बिके नहीं ..
भंडार-पाल की आँखों में
खटक रहे थे .

सज्जन ,कुछ जाने -पहचाने से लगे
मैं ,ठिठका,मुडा
उनकी ओर बढ़ा
सवालिया ,नजर से निहारने लगा उनको

 वे बोले
पहचाना नहीं ,क्या मुझे ?
सारा हिंदुस्तान मेरा घर है
मेरा नाम ,तिरंगे लाल चक्रधर है
मुझे नहीं पहचानोगे ,तो पछताओगे
इतिहास के पन्नों में कहीं न रह जाओगे .

मैंने पूछ लिया ,
अरे तिरेंगे लाल जी आप ?
आप अभी तक यहाँ क्या कर रहे हैं ?
आज तो पद्रह अगस्त है
सारे बड़े -बड़े लोग आपही के नाम पर व्यस्त हैं .

उन्होंने एक गहरी बात कही
यार !
सारा हिंदुस्तान आज मेरे उन भाईओं के नाम पर दीवाना होता है
जो बिक चुके होते हैं .
मेरा खरीददार नहीं मिला
सो ,मैं यहाँ लटक रहा हूँ
और इस बेचारे भंडार -पाल की आँखों में
खटक रहा हूँ .
ले चलो ना ,तुम मुझे अपने साथ .
बोर हो गया हूँ मैं
थुल- थुले,लिजलिजे स्पर्शों से
 घिन आती है मुझे .

मैंने कहा
तिरंगे लाल जी मैं आपको ले जाकर कहाँ रखूँगा
मैं भारत का आम आदमी हूँ
मेरे पास तो न लाल किला है न गाँधी मैदान
न रंगाई न पुताई 
न बाँटने को मिठाई.
न फौजों की टोली
न भाषण की बोली
न स्वीडेन की तोपें
न इटली की गोली
कैसे होगी सलामी आपकी ? 
                                                                       .....पवन श्रीवास्तव

सोमवार, 30 जुलाई 2012

कजरी

हरी-हरी  दुबिया के मितवा बदरवा !
कहाँ गइले ....
  हमार हितवा बदरवा
  कहाँ गइले ..............?

गोरी-गोरी बहियाँ में मेहंदी रचावे के बा
अदरा में रोपनी के बिचड़ा लगावे के बा
कजरी के नजरी में अँजे के कजरवा
कहाँ गइले.....?
हमार हितवा बदरवा
कहाँ गइले ...................?

ढोलकी मढावे के बा ,तबला छवावे के बा
हुडुका के मेखली प चाम चढ़वावे के बा
बाँसवा-बँसुरिया के कांट भइल ठोरवा
   कहाँ गइले .............?
   हमार हितवा बदरवा
   कहाँ गइले .......................?

 जेने -जेने देख तानी ,एके लेखा हाल बा
 मोरिनी पिआसल बिया ,मोरवा बेहाल बा
धुरिया -उडान भइल बाबा के पोखरवा
 कहाँ  गइले ..............................?
हमार   हितवा बदरवा
 कहाँ गइले ........................................?
                                                पवन श्रीवास्तव .             

शुक्रवार, 29 जून 2012

आज के गाँव

गंउआ में अजबे बतास बा
गंउआ के मनवा उदास बा !

 घरवा के भीतरी ,भीतरिया के घरवा में
नगवा नगिनिया के बास  बा
सउरी के घरवा में बिरनी के खोंता
सिकहर प टांगल    अन्हार बा

देवता के घरवा में भूतवा रोएला
भंडरवा दलिदरी के बस बा

गउआ के मनवा उदास बा ...

जाँतवा के घरवा में जाँतवा अकेले
ढेंकवा में ढ़ेकवा के लास बा
नएकी बहुरिया के कोनवा-कोठारिया में
कहिए के जामल झलास बा

तुलसी-चउतरा प कुकुर के डेरा
आजी के डेउढ़ी में घास बा

गंउआ के मनवा उदास बा....

बहरी दलानी में बाबा के खाटी
उड़ीस के  इन्द्रा -आवास बा
बडकी केंवाडिया के कुर्सी गढ़ा के
बबुआ के डेरा भेजात  बा

गईअन के नदवन में  चूना फुलावल  जाता
खुंटवन में  दिअका के  बास बा

गंउआ के मनवा उदास बा.......

खिस्सा-कहनियन के टटके समाधी
कउडा के जरिए कोडात बा
निमुआ,अनरवा ,पपितवा के जगहा  प
रेंगनी , धमोइआ  पोसात बा

सातो रे बहिनिया के झुलुहा छिटाइल
 निमिया के पेटेंट लिखात बा

गंउआ के मनवा उदास बा ....

लोंघडल चुहानी में घिउआ के कांटी
दही के नादा भुआत बा
ओटवा के घिंड़सिर प  घइला  ना  गगरी
पुअरा के बीठा सुखात बा

पकवा -ईनरवा के जामुन-जमोट्वा प
आसन जमवले पिआस बा

गंउआ के मनवा उदास बा .......

बाहर दुआरी प खूंटा ना खूँटी
मिसरी के नदिया में चूँटा ना चूँटी
 तोसक ना तकिया  ना कम्मर रजाई
 थाकल बटोही के के ठहराई

हथवा मिलल  बाटे ,मनवा मिलल नइखे
सबके करेजा में घात बा

गंउआ के मनवा उदास बा .........

पुरुब के नदिया के नेटी  टिपाइल
बिजली के खाम्हा गड़ात बा
नब्बे  निमनकन के सहरे में डेरा
दसवा खरबकन के गाँव   बा

स्वर्णिम -चतुर्भुज के पोंछा बनावे खाती
गंउआ के पगरी फरात बा

गंउआ के मनवा उदास बा....

उतरी -मंदिरिया में दिअना जरत नइखे
दखिन सिवाला में जलवा चढ़त नइखे
सादी -बिआह चाहे बरही-किरिअवा में
सबहर सवांगन  के नेवता फिरत नइखे

संझवत के डेहरी प डूबती किरिनिया में
लछिमी के दिअवा धुंआत बा

गंउआ के मनवा उदास बा ....

बैरी पढ़इआ  से मतिया हेराइल
पिअहा-इनरवा में भंगिया घोराइल
फगुओ -दसहरा में घरवा ना आवे
सोनवा बटोरे में बबुआ भुलाइल

लन्दन अमीरका के फेरा में आपन
गंउआ के नांउओं भुलात बा

गं उआ के मनवा उदास बा ....

कतनो बुढ़ाई त माइए कहाई
गंउँअन के माटी ह देसवा के माई
 बबुओ बुढइहें त बबुए कहइ हें
कहिओ ना कहिओ इ बतिया  बुझाई

बतिया बुझाई    त घरवा लवटिहें
माई के मनवा में आस बा ...
माई के मनवा में आस बा।......
                                                   .......पवन श्रीवास्तव

 
 


  

गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

ungliyan tham ke chalna.......

उँगलियाँ थाम के चलना ,मैं भटक जाऊंगा
तुम मुझे छोड़ के जाओगे तो थक जाऊंगा

ग़मज़दा पलकों में ठहरा हुआ पानी हूँ मैं,
मुझको छेड़ोगे तो छूते ही छलक जाऊंगा .

घर भी जाना है कि अब और पिलाओ न मुझे
मैं नशे में हूँ    कहीं और          बहक जाऊंगा .

तुम जो यादों कि किताबों के वरक पलटोगे
एक लम्हे के लिए मैं भी     झलक जाऊंगा.

मैं "पवन" हूँ मुझे चन्दन का बदन छूने दो
तेरी खुशबू को लिए दूर तलक जाऊंगा.
                                                        .......पवन श्रीवास्तव     

मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

मुश्किलों को सादगी की आँख से देखो ,सुनो
जिन्दगी को जिन्दगी की आँख से देखो ,सुनो.

कोहसारों में छुपी है रौशनी ही रौशनी
पत्थरों को जौहरी की आँख से देखो,सुनो.

आपको अपना कोई चेहरा नज़र आ जाएगा
आईने को मुफलिसी की आँख से देखो ,सुनो.

जिन्दगी यकलख्त पैराहन बदल कर आएगी
आंसुओं को गुद-गुदी की आँख से देखो ,सुनो.

हर ग़ज़ल अपनी भजन  जैसी लगेगी आपको
शाइरी को बंदगी की आँख से देखो,सुनो.

बस्तिओं  में घर ही घर होंगे तुम्हारे वास्ते
ये सफ़र आवारगी की आँख से देखो,सुनो.
                                                          .........पवन श्रीवास्तव. 

शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

रोजमर्रे की रोजगारी में रोज जीता है रोज मरता है ......

रोजमर्रे  की रोजगारी में     रोज जीता है          रोज मरता है ,
वो कभी मौत से नहीं डरता ,बस , मगर ज़िन्दगी से डरता है.

उसकी बीवी भी काम करती है ,उसके बच्चे भी काम करते हैं,
जो की दादा ने कर्ज खाया था   ,सारा कुनबा उसी को भरता है.

हर सुबह शह्र को निकलता है ,शाम ढलने पे घर को आता है,
जिस गली से उधार  लेता है  ,उससे बच-बच के ही गुजरता है.

घर में अपनी थकन से ,बीवी से और फिर मच्छरों से लड़ता है ,
रोज    देसी शराब पीता है ,          तब कहीं  नींद में उतरता है.

यूँ तो दुनिया बदलती रहती है ,उसकी दुनिया मगर कहाँ बदली,
दायरा उसकी जिल्लतों का "पवन " देखिए कब तलक बिखरता है.
                                                         ........पवन श्रीवास्तव.

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

रचनाएं ! जो गाँव में रची गईं ...............!

                                                                         १...
ताड़ी कहे ताड़ से ,कि,मांग करो सरकार से
हमरो रेट बढे के चाहीं,फैसन के रफ़्तार से 

नाम बा हमरो नीसा में,हक बा हमरो हिसा में
सबसे ऊपर हम रहिला खिलल रहिला झिसा में
हम रहीं लबना -लबनी में, दारू बैठे सीसा में

लुक-छीप के मत पीअ मत पीअ लोटा में
फ्री सेल में न पिअब ता अब का पीअब कोटा में  
       (यह रचना तब जन्मी थी जब लालू जी ने ताड़ी पर से टैक्स हटा लिया था                                                                 ...रचनाकार अज्ञात

बुधवार, 23 नवंबर 2011

                                                                   कुंडली
                                                                 .............
नया जमाना आ गया ,मुक्त हुआ व्यापार,
व्यर्थ अर्थ के स्वार्थ का गर्म हुआ बाजार,
गर्म हुआ बाजार ,ये घर-घर घुसा हुआ है
अपना आदम-जात इसी में  फंसा हुआ है,
                     कह मूरख कविराय ,सुनो भारत के भाई ,
                     परमारथ   की गाय   हाँक ले गए कसाई !!
                                                                             .......पवन श्रीवास्तव

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

पाँव उठते हैं कि गिरते हैं ........

पाँव उठते हैं कि गिरते हैं,ये चलना तो नहीं 
चार,  दीवार उठा लेना ही ,  बसना तो नहीं 

उम्र भर भागते रहने से   भला क्या हासिल 
भागना ? भागना होता है , पहुंचना तो नहीं 

ये जो झुकता है मेरा सिर ,तो सिर नहीं हूँ मैं 
यूँ ,एह्तारामे-हकीक़त कोई झुकना तो नहीं 

मैंने लम्हों से सुलह  की है,     जमाने से नहीं  
मेरा छुपना ?मेरा बचना ? मेरा डरना तो नहीं  

तुम जो कहते हो उसे गौर से सुनता है "पवन "
पर ,महज गौर से सुनना ही समझना तो नहीं.
                                                                 ........पवन श्रीवास्तव 


मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011

कल्पना

कल्पना !
अस्वीकार से जनमती है .
अस्वीकार !
ऊर्जा के ऊफान से निकलता है.
ऊर्जा और प्रज्ञा के व्याघात हैं विचार ..........
विचार !
कल्पना नहीं है .
कल्पनाएँ !
आदमी का साथ छोड़ने लगें
तो, प्रलय है.......
फिर महाप्रलय की कल्पना .
फिर नई सृष्टि की कल्पना.......
कल्पना !
तेरे बाँए अनंत अर्ध-विराम हैं.,,,,,,......
तेरे दाएँ कोई पूर्ण-विराम नहीं ...............

                                                     ......पवन श्रीवास्तव

सत्यम शिवम सुन्दरम

सत्य के ,
कटु,तिक्त और रस से रिक्त होने का बयान ?
किसी बाँझ की प्रसव-पीड़ा ,किसी क्लीव की काम-क्रीडा जैसा
अनूठा बयान है .
सरासर झूठा बयान है ....

ध्वनि-विस्तारक चोंगों से चीखतीं
हवाओं में गड्ड-मड्ड होतीं
कटु सच्चाइयाँ ?
झूठ की परछाइयाँ हैं ...
भ्रम-संध्याओं में छायाएं  !
अपनी काया से बड़ी हो गयीं हैं ....

कचकडे के क्लिपों से चपीं,
सूख-सूख कर ऐठ गयीं हैं
रस-श्रावी ग्रंथियां ...!.........इन्द्रियाँ...... ?
मुँह ढाँप कर सो गयीं हैं ..

सच और झूठ के इन कटु-मधु बयानों के संजाल से ..
तड़प भागे .आदमी के पीछे ....
हाथ धो कर पडी हैं ...........
आचार-संहिताओं   की    सशस्त्र सेनाएं .......!!!!!!!!!!!!!!
                                                       ........पवन श्रीवास्तव

रविवार, 31 जुलाई 2011

कहीं भी जाओ..........

कहीं भी जाओ , सदाएँ तलाश लेती  हैं
"फकीर मन को" , दुआएँ तलाश लेती हैं .

ये ऐसा जख्म कि,इसके लिए न रोए कोई
"दिलों के दर्द" ,         दवाएँ तलाश लेती हैं .

नज़र के सामने कर लें या छुप-छुपा के कहीं
"मेरा गुनाह"              सजाएँ तलाश लेती हैं .

सही के  फर्द-बयाँ को दबा के क्या हासिल
"दबी जुबाँ " को      कथाएँ तलाश लेती हैं.

मैं अपना नाम किसी से कहूँ ,कहूँ न कहूँ
मेरा वजूद ,           हवाएँ तलाश लेती हैं .
            
                        .........पवन श्रीवास्तव


मंगलवार, 26 जुलाई 2011

बेचैनी के रक्त-बीज

मैं !
अगर कवि होता ?
तो,
कभी दीवार में सिर नहीं मारता !
नहीं बहता खून , मेरे सिर से
खून की नदी में ,सिर बहते |

मेरे अंतस के उज्बुजाते शब्द !
छछनते छंद !                                                                             
चीर कर निकलते ...
कलम का सतवांस  गर्भ.
बेमेल वर्जनाओं के चटकते टाँकों की प्रतिध्वनि से
झनझना उठते तुम्हारे कान के परदे ...

कितना बड़ा अपशकुन हो जाता ?
कि.......,
मेरी पुतलियों से निकलता ,आग ताप कर सूरज .
मेघ ! उमड़ते,! घुमड़ते,! तड़कते !!
और,......
मेरी गर्म साँसे ?
किसी धधकती ज्वाला-मुखी में तब्दील हो जातीं .

मेरी दमित इच्छाओं कि ऊष्मा से ...
सब कुछ अस्त-व्यस्त हो जाता ...!
सिंघासन कि शोभा !
उतार लाते ,भूमि-पुत्र ,,.
लोग ! जूतों समेत ,धड-धडाते हुए.....
भगवान् के घर में ..घुस जाते.

बंद हो जाता उनका कारोबार ...!
जो, खुद ठंढ से बचने के लिए ,
हमारी पीठ पर ,,ऊन की फसल काटते हैं
और लौट कर ,हमारी ही बस्ती में
गर्म उतरनों की खैरात बाँटते हैं ...|

आखिर !, कब तक चलता यह सिलसिला .......
कि  !......
कभी असंख्य वाणों से बिंधा खरगोश ,कहीं से हाँफता हुआ आता 
समा जाता मेरे भीतर ........
दम तोडतीं अनंत प्यासी नदियाँ ......
तैर -तैर जातीं मेरी शिराओं में ...
आखिर कब तक ......?
कभी ब्रम्हास्त्रों के प्रयोग कि आशंका से सहमी  सभ्यता के ,
विकलाँग भ्रूणों कि सिसकियाँ..,
कभी ,दम तोडती पागल परिभाषाओं का नग्न प्रलाप...
तो ! कभी अपनी जड़ों कि तलाश में भटकते
लाजवंती -वणों का क्रौच-विलाप !......
ऊ...फ ...!
बेचैन हो जाता मैं ..!...बेहाल हो जाता मैं ..!
दरक जाता मर्यादा का बाँध ...
कागजी -कंक्रीट क़ी नींव पर इतरातीं आचार-संहिताओं के गगन -चुम्बी ताश-महल !
भर -भरा  कर ,ढहते !
और.........!
मेरे माथे से टपकते ,बेचैनी के रक्त-बीज !
बन - बना कर उगते ....
ढाँप देते ,धरती का उघड़ता बदन ....!
अगर मैं कवि होता ......
                                                              ................पवन श्रीवास्तव                  

शनिवार, 23 जुलाई 2011

कुछ भी मेरे पास नहीं है ................

कुछ भी मेरे पास नहीं है
कोई तजुर्बा खास नहीं  है

आपके इस अंदाजे-बयाँ में
बात तो है एहसास नहीं है

बैरागी बनने की   कोशिश
कोशिश है ,सन्यास नहीं है

एक ही घर में चुप-चुप रहना
साथ तो है ,सहवास   नहीं है

लेकर,लिखना,लिख कर देना                   
मुझको  ये   अभ्यास नहीं है   
                                          
                                    ......... पवन श्रीवास्तव 



शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

मैं लिखना चाहता हूँ एक कविता ............

मैं लिखना चाहता हूँ एक कविता
ताजा -तरीन ,सर्वथा नवीन
जो,गांडीव की टंकार-ध्वनि की सवारी कसे
और संपूर्ण मिथ्यांचल पर मारण-मंत्र की तरह           
मंडराती रहे ....
लेकिन , मैं यह भी जानता  हूँ
कि,मुझे प्रतीक्षा करनी होगी
तब तक
जब तक कि मेरे खुद के बोए                               
शब्द-बीज !
अंकुरित,पल्लवित ,पुष्पित
और फलित न हो जाएँ
                             ..............पवन श्रीवास्तव .

सोमवार, 18 जुलाई 2011

mausam ke mijaajon sa..............

मौसम के मिजाजों सा परिवेश बदल लेते हैं
मन रंग बदलता  है     हम वेश बदल लेते हैं |

बचपन के    रिश्तों को       कैसे कोई ढूंढें ?
हम,! उम्र बदलते हैं ,वो देश बदल लेते हैं |

हम में , उनमें यारों ,    इतना ही अंतर है
हम मूल बदलते हैं,  वो शेष  बदल लेते हैं |

संकेत की दुनिया में ,     कोई हेरा-फेरी है
वरना कैसे ये लोग   सन्देश बदल लेते हैं ?

मुझे कैद उम्र भर की,और तुमको सजा-ए-मौत
आओ ! मेरे भाई               आदेश बदल लेते हैं ||

                                                 ................ पवन श्रीवास्तव  

   

गुरुवार, 14 जुलाई 2011

tapish itni.........

तपिश इतनी कि गल सकता है कोई 
किसी सांचे में  ढल सकता    है  कोई.

जहां         राहें फिसलती जा रही हों
वहां कब तक संभल सकता है कोई 

किसी पर भी यकीं होता नहीं है
बताशे से बहल सकता है कोई .

किसी काँधे पे कोई सर लगा कर
सरे- बाज़ार छल सकता है कोई.

अभी इन चुप्पियों को छेडिये मत
कि  छूते ही उबल सकता है कोई

ये मत समझो कि अब कुछ भी नहीं है
अंधेरों से निकल  सकता         है कोई

जरा रुक कर हवाओं को सदा दो
तुम्हारे साथ चल सकता है कोई

:"पवन" की आँच बढती जा रही है
अब उसके साथ जल सकता है कोई ||

                                              .........पवन श्रीवास्तव