मौसम के मिजाजों सा परिवेश बदल लेते हैं
मन रंग बदलता है हम वेश बदल लेते हैं |
बचपन के रिश्तों को कैसे कोई ढूंढें ?
हम,! उम्र बदलते हैं ,वो देश बदल लेते हैं |
हम में , उनमें यारों , इतना ही अंतर है
हम मूल बदलते हैं, वो शेष बदल लेते हैं |
संकेत की दुनिया में , कोई हेरा-फेरी है
वरना कैसे ये लोग सन्देश बदल लेते हैं ?
मुझे कैद उम्र भर की,और तुमको सजा-ए-मौत
आओ ! मेरे भाई आदेश बदल लेते हैं ||
................ पवन श्रीवास्तव
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सोमवार, 18 जुलाई 2011
गुरुवार, 14 जुलाई 2011
tapish itni.........
तपिश इतनी कि गल सकता है कोई
किसी सांचे में ढल सकता है कोई.
जहां राहें फिसलती जा रही हों
वहां कब तक संभल सकता है कोई
किसी पर भी यकीं होता नहीं है
बताशे से बहल सकता है कोई .
किसी काँधे पे कोई सर लगा कर
सरे- बाज़ार छल सकता है कोई.
अभी इन चुप्पियों को छेडिये मत
कि छूते ही उबल सकता है कोई
ये मत समझो कि अब कुछ भी नहीं है
अंधेरों से निकल सकता है कोई
जरा रुक कर हवाओं को सदा दो
तुम्हारे साथ चल सकता है कोई
:"पवन" की आँच बढती जा रही है
अब उसके साथ जल सकता है कोई ||
.........पवन श्रीवास्तव
किसी सांचे में ढल सकता है कोई.
जहां राहें फिसलती जा रही हों
वहां कब तक संभल सकता है कोई
किसी पर भी यकीं होता नहीं है
बताशे से बहल सकता है कोई .
किसी काँधे पे कोई सर लगा कर
सरे- बाज़ार छल सकता है कोई.
अभी इन चुप्पियों को छेडिये मत
कि छूते ही उबल सकता है कोई
ये मत समझो कि अब कुछ भी नहीं है
अंधेरों से निकल सकता है कोई
जरा रुक कर हवाओं को सदा दो
तुम्हारे साथ चल सकता है कोई
:"पवन" की आँच बढती जा रही है
अब उसके साथ जल सकता है कोई ||
.........पवन श्रीवास्तव
मंगलवार, 26 अप्रैल 2011
जंगलों ने, नदी ने हवा ने ,चुपके चुपके कई जंग झेले
इनसे लड़ते झगड़ते ,जहाँ में ,आदमी रह गए हैं अकेले
पर -शिकश्ता परिंदे की नाई फरफराते रहे हैं क़फ़स में
कोई पूछे तो हम क्या कहेंगे बस वही जिंदगी के झमेले
तेज-रफ्तारगी से उलझ कर ,अब तो सांसें उखड़ने लगी हैं
कोई आकर मेरी जिंदगी से मेरी बाक़ी बची उम्र ले ले
एक बाज़ी बची रह गई है इसलिए हम जिए जा रहे हैं
वर्ना मुझ पर मेरे दोस्तों ने एक से बढ़ के इक दाँव खेले
अपने जज्बों की सौगात ले क़र हम भी बाजार में आ गए थे
फिर समेटो पवन शामियाना अब उजड़ने लगे दिल के मेले
------- पवन श्रीवास्तव
------- पवन श्रीवास्तव
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