शनिवार, 30 अप्रैल 2011

भोजपुरी गीत

मन के बात कहे द  ए मितवा
मन के बात कहे द !.............!!

                           दुपहरिया में      रात  भइल बा       
                           मौसम से कुछ घात भइल बा
                             
                          खेत -बधार         सुखाइल जाता
             
                           अंगना में       बरसात भइल बा

भीतर झंझावात उठल बा
बाहर बांध ढहे द ........!

ए मितवा ! मन के बात कहे द ..........!!

                                 सबके हाल बेहाल भइल बा
                                  साँच उचारल काल  भइल    बा

                                   के        केकरा से   पूछे  जाए
                                   सउँसे शहर सवाल भइल बा 

मरण-दूत ललकार रहल बा
अमर -पिनाक गहे द .......!

ए मितवा  ! मन के बात  कहे द

ए मितवा  ! मन के बात कहे    द ............!! 
                                           
                                                                        .......पवन श्रीवास्तव                                                               

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

आशियाने की क़सम

आशियाने की क़सम
आबो-दाने की क़सम

झूठी  खाऊंगा     नहीं
मैं निभाने की क़सम

जिसपे कायम है खुदा
उस बहाने की क़सम

कोई   देता  ही    नहीं
दिल लगाने की क़सम 

आज   फिर   टूट   गई
फिर न आने की क़सम

जाइए  ले  के   मगर
लौट आने की क़सम

                                     .............पवन श्रीवास्तव
               





मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

जंगलों ने, नदी ने हवा ने ,चुपके चुपके कई जंग झेले
इनसे लड़ते झगड़ते ,जहाँ में ,आदमी रह गए हैं अकेले
   
पर -शिकश्ता परिंदे की नाई फरफराते  रहे हैं क़फ़स में
कोई पूछे तो हम क्या कहेंगे बस वही जिंदगी के झमेले

तेज-रफ्तारगी से उलझ कर ,अब तो सांसें उखड़ने लगी हैं
कोई आकर मेरी जिंदगी से मेरी बाक़ी बची उम्र ले ले

एक बाज़ी बची रह गई है इसलिए हम जिए जा रहे हैं
वर्ना मुझ पर मेरे दोस्तों ने एक से बढ़ के इक दाँव खेले

अपने जज्बों की सौगात ले क़र हम भी बाजार में आ गए थे
फिर समेटो पवन शामियाना अब उजड़ने लगे दिल के मेले

------- पवन श्रीवास्तव 



 
 

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

आहटें फिर से आने लगी हैं

आहटें फिर से आने लगी हैं 
कोशिशें सुगबुगाने लगी हैं  

कोई आवाज देने लगा है
चुप्पियाँ गुनगुनाने लगी हैं

कोई हलचल है सागर के तल में
कश्तियाँ डगमगाने लगी हैं

आपको छू के गुजरी हवाएं
अब मुझे गुदगुदाने लगी हैं

देखना कोई आंधी उठेगी
चीटियाँ घर बनाने लगी हैं

मेरी आवारगी के तजुर्बे
पीढियां आजमाने लगी हैं

-----पवन श्रीवास्तव 

रविवार, 10 अप्रैल 2011

कत्ता

हर जगह बेखोफ होकर झूम सकती है,
 जिंदगी भर मौत को भी चूम सकती है
नवजवानों की तरह सोचा करो तो,
उम्र की सुई भी पीछे घूम सकती है.
---पवन श्रीवास्तव 

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

बहरूपिया-2

मैं देख रहा हूँ.....
मेरे चतुर्दिक
तेज़ बवंडर उठ रहे हैं
एक बहुरूपिया
मेरे नखाग्रों पर उभरता, इतराता
नाच रहा है
बांच रहा है अठारह अध्याय, सात सौ श्लोक
कभी शास्त्र, कभी लोक
मैं देख रहा हूँ....
मैं देख रहा हूँ
बहरूपिया वेश बदलते-बदलते थक गया है
पक गया है उसके चेहरे का गीला कच्चा रंग
अंग-अंग अभंग त्वचा का रोम-रोम
भष्म भभूत से ढक गया है
मैं देख रहा हूँ.....
मैं देख रहा हूँ
उसके रंग-बिरंगे मुखौटे बरगद की बरोहें थामे
कजरी-कजरी झूला झूल रहे हैं
दिगंत तक दौड़ लगा रहे हैं उसके गीत
मैं देख रहा हूँ.....
मैं देख रहा हूँ
असंख्य बाल-बहरूपिये
बरगद की ओर भागे चले आ रहे हैं
पेंग मारते मुखौटे आकाश में उड़ चलें हैं
मैं देख रहा हूँ.....
मैं देख रहा हूँ
अपनी धुरी पर चक की तरह नाचता बहरूपिया
धीरे-धीरे मेरी ओर बढ़ रहा है
धीमी-धीमी विद्युत्-तरंगों की तरह मेरी शिराओं में चढ़ रहा है
गढ़ रहा है
फिर से एक नया आकाश
देखते-देखते
प्रलय की अद्भुत लय पर
नाच उठते हैं बेड़ियों में जकड़े मेरे पाँव
और फिर कभी न सोने के लिए
धीरे-धीरे जाग रहा है
मेरे भीतर
मेरा अपना गाँव.


बहुरुपिया

मैं देख रहा हूँ......
मेरे भीतर तेज़ बवंडर उठ रहे हैं
कोई बहुरूपिया मेरी ग्रंथियों के चौराहे पर खड़ा
हांक लगा रहा है
मेरी रगों में आकाश की तरह बह रहा है
जाने किस-किस भाषा में क्या-क्या कह रहा है
मैं देख रहा हूँ......
मैं देख रहा हूँ
बहरूपिया,
कभी योगी, कभी कामी
कभी भिक्षु, कभी स्वामी
कभी औघड़, अवधूत, मुक्तिदूत-बागी का
रूप धर रहा है
जाने क्या-क्या कर रहा है
मैं देख रहा हूँ.....
मैं देख रहा हूँ
बहरूपिया अपने पूरे रौ में है
हवा में लहराते सन की तरह सफ़ेद
उसके केश, उसकी दाढ़ी
पलकों के पालने में जुड्वें सूर्य सी लेटीं
उसकी पुतलियाँ
दसों दिशाओं पर ध्वज की तरह फहरातीं
उसकी भुजाओं के शीर्ष पर थिरकतीं उसकी उँगलियाँ
ब्रह्मांड का भूगोल उकेर रहीं हैं
मैं देख रहा हूँ......
मैं देख रहा हूँ
हवाएं उठाकर ले भाग रही हैं
उसके शब्दों की डोली
जो कुछ मेरे हिस्से का बच रहा है
मैं चुन रहा हूँ.....
मैं सुन रहा हूँ
लम्बे समय से चुप्पी की ऊब सह रहा हूँ
अब कह रहा हूँ.....
अब कह रहा हूँ