शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

रोजमर्रे की रोजगारी में रोज जीता है रोज मरता है ......

रोजमर्रे  की रोजगारी में     रोज जीता है          रोज मरता है ,
वो कभी मौत से नहीं डरता ,बस , मगर ज़िन्दगी से डरता है.

उसकी बीवी भी काम करती है ,उसके बच्चे भी काम करते हैं,
जो की दादा ने कर्ज खाया था   ,सारा कुनबा उसी को भरता है.

हर सुबह शह्र को निकलता है ,शाम ढलने पे घर को आता है,
जिस गली से उधार  लेता है  ,उससे बच-बच के ही गुजरता है.

घर में अपनी थकन से ,बीवी से और फिर मच्छरों से लड़ता है ,
रोज    देसी शराब पीता है ,          तब कहीं  नींद में उतरता है.

यूँ तो दुनिया बदलती रहती है ,उसकी दुनिया मगर कहाँ बदली,
दायरा उसकी जिल्लतों का "पवन " देखिए कब तलक बिखरता है.
                                                         ........पवन श्रीवास्तव.

2 टिप्‍पणियां:

  1. यह उस आदमी की व्यथा है जो दिनोंदिन गरीब होता जा रहा है. आजादी के बाद अपने देश में केवल मत दाता बना रह .

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  2. हर सुबह शह्र को निकलता है ,शाम ढलने पे घर को आता है,
    जिस गली से उधार लेता है ,उससे बच-बच के ही गुजरता है.

    नज़्म और अफ़साने की तासीर लिए उम्दा ग़ज़ल..खूब!

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