रविवार, 9 अक्तूबर 2011

पाँव उठते हैं कि गिरते हैं ........

पाँव उठते हैं कि गिरते हैं,ये चलना तो नहीं 
चार,  दीवार उठा लेना ही ,  बसना तो नहीं 

उम्र भर भागते रहने से   भला क्या हासिल 
भागना ? भागना होता है , पहुंचना तो नहीं 

ये जो झुकता है मेरा सिर ,तो सिर नहीं हूँ मैं 
यूँ ,एह्तारामे-हकीक़त कोई झुकना तो नहीं 

मैंने लम्हों से सुलह  की है,     जमाने से नहीं  
मेरा छुपना ?मेरा बचना ? मेरा डरना तो नहीं  

तुम जो कहते हो उसे गौर से सुनता है "पवन "
पर ,महज गौर से सुनना ही समझना तो नहीं.
                                                                 ........पवन श्रीवास्तव 


1 टिप्पणी:

  1. RAJIV RANJAN CHOUDHARY, DELHI BIHAR21 अक्तूबर 2011 को 9:24 pm

    सोना जागना रैन बसेरा, ये शहर अपना तो नहीं.
    मौसम की पहली बारिश में मिट्टी की सोंधी खुशबु,
    नालों में दुबे शहरों से, ये पीछे रहना तो नहीं.

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