मंगलवार, 26 जुलाई 2011

बेचैनी के रक्त-बीज

मैं !
अगर कवि होता ?
तो,
कभी दीवार में सिर नहीं मारता !
नहीं बहता खून , मेरे सिर से
खून की नदी में ,सिर बहते |

मेरे अंतस के उज्बुजाते शब्द !
छछनते छंद !                                                                             
चीर कर निकलते ...
कलम का सतवांस  गर्भ.
बेमेल वर्जनाओं के चटकते टाँकों की प्रतिध्वनि से
झनझना उठते तुम्हारे कान के परदे ...

कितना बड़ा अपशकुन हो जाता ?
कि.......,
मेरी पुतलियों से निकलता ,आग ताप कर सूरज .
मेघ ! उमड़ते,! घुमड़ते,! तड़कते !!
और,......
मेरी गर्म साँसे ?
किसी धधकती ज्वाला-मुखी में तब्दील हो जातीं .

मेरी दमित इच्छाओं कि ऊष्मा से ...
सब कुछ अस्त-व्यस्त हो जाता ...!
सिंघासन कि शोभा !
उतार लाते ,भूमि-पुत्र ,,.
लोग ! जूतों समेत ,धड-धडाते हुए.....
भगवान् के घर में ..घुस जाते.

बंद हो जाता उनका कारोबार ...!
जो, खुद ठंढ से बचने के लिए ,
हमारी पीठ पर ,,ऊन की फसल काटते हैं
और लौट कर ,हमारी ही बस्ती में
गर्म उतरनों की खैरात बाँटते हैं ...|

आखिर !, कब तक चलता यह सिलसिला .......
कि  !......
कभी असंख्य वाणों से बिंधा खरगोश ,कहीं से हाँफता हुआ आता 
समा जाता मेरे भीतर ........
दम तोडतीं अनंत प्यासी नदियाँ ......
तैर -तैर जातीं मेरी शिराओं में ...
आखिर कब तक ......?
कभी ब्रम्हास्त्रों के प्रयोग कि आशंका से सहमी  सभ्यता के ,
विकलाँग भ्रूणों कि सिसकियाँ..,
कभी ,दम तोडती पागल परिभाषाओं का नग्न प्रलाप...
तो ! कभी अपनी जड़ों कि तलाश में भटकते
लाजवंती -वणों का क्रौच-विलाप !......
ऊ...फ ...!
बेचैन हो जाता मैं ..!...बेहाल हो जाता मैं ..!
दरक जाता मर्यादा का बाँध ...
कागजी -कंक्रीट क़ी नींव पर इतरातीं आचार-संहिताओं के गगन -चुम्बी ताश-महल !
भर -भरा  कर ,ढहते !
और.........!
मेरे माथे से टपकते ,बेचैनी के रक्त-बीज !
बन - बना कर उगते ....
ढाँप देते ,धरती का उघड़ता बदन ....!
अगर मैं कवि होता ......
                                                              ................पवन श्रीवास्तव                  

5 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर और भावपूर्ण अभिवयक्ति...

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  2. कभी ब्रम्हास्त्रों के प्रयोग कि आशंका से सहमी सभ्यता के ,
    विकलाँग भ्रूणों कि सिसकियाँ..,
    कभी ,दम तोडती पागल परिभाषाओं का नग्न प्रलाप...
    तो ! कभी अपनी जड़ों कि तलाश में भटकते
    लाजवंती -वणों का क्रौच-विलाप !......
    ऊ...फ ...!
    बेचैन हो जाता मैं ..!...बेहाल हो जाता मैं ..!

    गहरा दर्शन....अनूठे बिंब...लाजवाब कविता...बधाई

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  3. राजीव ,आरा ,बिहार3 अगस्त 2011 को 9:31 pm

    बंद हो जाता उनका कारोबार ...!
    जो, खुद ठंढ से बचने के लिए ,
    हमारी पीठ पर ,,ऊन की फसल काटते हैं
    और लौट कर ,हमारी ही बस्ती में
    गर्म उतरनों की खैरात बाँटते हैं ...|

    हमने कहा:-
    हवा का एक झोंका इन जज्बातों को हवा दे जाए.
    इस तपीस से निकले एक चिंगारी,
    कारोबार की बस्ती में धुँआ दीख जाए .

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  4. बहुत अच्छा राजीव /बहुत अछि टिप्पणी.

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